है मानव तुम कौन हो इस दुनिया में, यदि नहीं है पैसा तुम्हारे पास,
बिन पैसा के नहीं है मायने, ज़िंदगी हो जाती है उदास।
पैसा है मित्र, पैसा है संकटमोचन, और पैसा है दाता, विधाता,
पैसा है परम सखा, पैसा है भाई, पैसा है माता-पिता,
पैसा है आशा, पैसा है भरोसा और पैसा है मोह-माया,
पैसा है ऐश, पैसा है मौज, पैसा है आनंद और काया,
पैसा है खातिर, पैसा है मान, और पैसा है हर्ष-उल्लास,
पैसा है जीवन, पैसा है यौवन, पैसा है मिलता है दास।
पैसा है मान, पैसा है अभिमान, पैसा देता है सम्मान,
बिन पैसा के तुम कौन आदमी और कहां के हो इंसान,
पैसा देता है जीत, पैसा कराता है प्रीत, सब है पैसा की खेल,
नहीं है पैसा तुम्हारे पास, तो तुम हो ये जगत के वैल।
पैसा ही प्रेम, पैसा ही गेम, पैसा पलट देता है बाज़ी,
पैसा ही प्यार, पैसा ही आदर, होती है लड़की के बाप राज़ी,
पैसा ही ख़ुशी, पैसा ही बाज़ी, पैसा करता है करामात,
बिन पैसा के तुम्हारी इस दुनिया में क्या है औकात और बिसात।
पैसा है ताकत, पैसा है साहस, पैसा है परम तप,
पैसा है गुर, पैसा है गरूर, पैसा है परम प्रिय,
पलकों में पल बदल देता है पैसा, पल-पल में हम पैसा का खेल देखा,
बिन पैसा के तुम हो अकेला, लोग देते हैं पलकों में धोखा।
कौन अपना, कौन मित्र, सब देता है पैसा को दाम,
हो तुम बिन पैसा के, तुम्हारा यहां है क्या काम?
सब यहां चले पैसों से, पैसा है सबका मूल,
बिन पैसा के क्या कुछ कर लोगे, ये है तुम्हारी भूल।
संसार में है कौन अपना और पराया, सब करते हैं पैसा से प्रीत,
बिन पैसा के तुम कौन हो, लोग पल भर में भूल जाते हैं मीत,
पैसा बिन न यहां चले न कोई, पैसा का यहां है भाव,
पैसा है तो पराया अपना हो जाते, लोग नहीं करते मोल-भाव।
पैसा के आगे सब बिक जाते हैं, पैसा करता है इतना मजबूर,
पैसा के लिए तरस जाते हैं गुणवान, विद्वान लोग— बन जाते हैं मज़दूर,
पैसा वाला मूर्ख सेठ रौब झाड़ते खूब,
बिन पैसा के चतुर और समझदार लोग उसके आगे करते हैं जी-हुज़ूर।
पैसा है बात बन जाती है, नहीं रुकते कोई काम,
बिन पैसा के हो तुम निठल्ला, तुम्हारा यहां है क्या काम,
पैसा है तो लोग भूल जाते हैं कैसा है इंसान,
सत्ता, निष्ठा की क्या मोल है? बिक जाते हैं इंसान।
कौन धनी और कौन गरीब करते हैं पैसा तय,
बिन पैसा के क्या औकात है, नहीं मिलते यहां न्याय,
हारी बाज़ी पलट जाती है, करता है पैसा तय,
पैसा है तो कठपुतली भी बोल पड़ते हैं, करते हैं फैसला तय।
कौन सच्चा और कौन झूठा करते पैसा तय,
सच्चा यहां बिन पैसा के हार जाते हैं, बिक जाता है न्याय,
कोई कहते हैं सच्चाई की यहां जीत होती है, ये कोरा झूठ है भाई,
बिन पैसा के नहीं मिलते न्याय, यही है यहां सच्चाई।
मशहूर लोगों ने कहा है यहां, कानून है मकड़ी के जाल की तरह,
बिन पैसा के लोग कानून के जाल में फंसते हैं— छोटे कीड़े-मकोड़े की तरह,
बड़े अपराधी निकल जाते हैं चाहे कितना भी फैलाएं जाल,
पैसों से न्याय खरीदे जाते हैं, निकल जाते हैं राघव बोयाल।
पैसों के बिना यहां चले न कोई, पैसों के बिना बात बने न कोई,
पैसों के बिना सुने न कोई, पैसा यहां बना है साईं,
पैसों का है बड़ा महत्व, पैसों को लोग देते हैं अधिक गुरुत्व,
पैसों के बिना यहां तुम्हारा क्या है महत्व।
पैसा का है यहां बहुत अधिक महत्व,
परिवार, रिश्ता, नाता, प्रेमिका सबको है पैसा का गुरुत्व,
कितना तुम बबाल करोगे, कितना बनाओगे बात,
पैसों से यहां नापी जाती है तुम्हारी कितनी है औकात।
तुम कितना सच्चा और कितना अच्छा इंसान,
पैसों से यहां नापी जाती है तुम्हारी कितनी है यहां दाम,
कितना सच्चा और कितना भला नहीं यहां है मोल,
पैसा है तो लोग बोल पड़ते हैं, करते हैं हल्लाबोल।
बिन पैसा के टूट जाते हैं चाहे कितना हो सच्चा रिश्ता,
संसार में नहीं है कोई महान, कौन कैसे है, किसका है किससे वास्ता,
लोग यहां भूले जा रहे रिश्तों के महत्व को,
पैसा के पीछे पड़ी है संसार, भूल रहे हैं अपनों को।
पैसों के बिना यहां घर-परिवार हो जाते हैं छारखार,
पैसों के बिना चले न यहां एक दिन भी ये संसार,
पैसा के कारण यहां बन जाते कितना किस्सा और कहानियां,
बिन पैसा के रुक जाते हैं, एक दिन भी न चले दुनिया।
पैसा है यहां सबसे तेज, बिन पैसा के पूरे नहीं होते हैं सेज,
पैसा है यहां आन-बान और शान, पैसा को लोग बनाते भगवान,
बिन पैसा के यहां नहीं बनते कोई रिश्ता,
सपने यहां टूट जाते हैं, नहीं होते हैं कोई फ़रिश्ता।
पैसा यहां अति-सत्य है, देता है जीवन की सीख,
बिन पैसा के कुछ नहीं मिलता, नहीं देता है कोई भीख,
नाम-यश लोगों ने खूब कमाया, कमाया है बहुत पैसा,
बिन पैसा के क्या काम है— चलते हैं जैसा तैसा।
कौन अपना, कौन मित्र सब रिश्ते हो जाते हैं बेकार,
बिन पैसा के ज़िंदगी झंड है, खुद्दार बनते हैं मज़दूर,
पैसा यहां सब कुछ है— रिश्ता, नाता और प्रेम,
पैसा है तो मिल जाती हैं कई लड़कियां, करती हैं प्रेम।
चोरी-जारी करते हैं लोग, करते हैं हेराफेरी,
पैसा यहां मुख्य कारण है, करते हैं लोग सीनाजोरी,
पैसा यहां जाति चिनाते हैं, करते हैं लोग लूटपाट,
पैसा यहां कलह का मूल, जीवन में बढ़ गई है झंझट।
पैसों के लिए बिक जाते हैं जीवन, यौवन और शरीर,
कहते हैं लोग चले गए जीवन, यौवन और ज़मीर,
पैसों के लिए लोग पागल हो जाते हैं, करते हैं नाना छलना,
पैसों के लिए लोग नहीं हिचकिचाते, अपनाते हैं चतुराई और कपटना।
पैसा की महिमा लोग गाते जाते हैं, नहीं थकते ये दुनिया,
पैसा ऐसा चीज़ है जो नन्हे भी समझते हैं, समझती है ये दुनिया,
कैसा इंसान हो तुम, कितना अच्छा इंसान हो तुम भाई,
गलती का यहां कोई गुंजाइश नहीं, लोग गिन लेते हैं पाई-पाई।
पैसा का यहां है खूब महिमा, बयान करते हैं पैसावाले लोग,
बिन पैसा के मर जाते हैं, कोई खोज-खबर नहीं लेता है लोग,
बिन पैसा के लोग यहां नहीं देते हैं कोई भाव,
ज़िंदगी भर ठोकर खाते फिरोगे, लड़की नहीं देगी कोई भाव।
पैसों के बिना यहां कुछ नहीं होता, भागते फिरते हैं लोग,
बिन पैसा के क्या रौब दिखाओगे, मित्रता नहीं करते लोग,
पैसा के लिए लोग भागते फिरते हैं, समय नहीं किसी के पास,
बिन पैसा के कैसे जिओगे? नहीं है यहां कोई आस।
पैसा ही यहां सफलता है, पैसा देता है बड़ा सुख,
बिन पैसा के कुछ नहीं मिलता, जीना है यहां बड़ा दुख,
पैसा है तो यहां इज़्जत है, मिलता है नाम-यश और दाम,
पैसा कमाना कठिन चैलेंज है, लोग नहीं देते दो कौड़ी का दाम।
पैसा से ही रिश्ता चलता है संसार में, पैसा है संसार की मूल,
बिन पैसा के जो सपना देखते हैं, ये है उनकी भूल,
पैसा बिना ढह जाते हैं दालान, कोठा और काया,
कहते हैं लोग बात-बातों में— “बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा है रुपैया।”
पैसा ही यहां सब कुछ है, पैसा ही है बड़ा धर्म,
नेक-नीति यहां मायने नहीं रखती, पैसा कमाना ही बड़ा कर्म,
पैसा की महिमा खत्म नहीं होती, महिमा है यहां अपार,
कौन कितना बड़ा आदमी है, पैसा से दिखता है ये संसार।
1. पैसा इंसान की पहचान तय करने लगा है:-
इस कविता का पहला बड़ा संदेश यह है कि आज इंसान की पहचान, सम्मान और अस्तित्व का आधार पैसा बन चुका है। समाज में यह सोच घर कर गई है कि जिसके पास पैसा नहीं है, उसकी कोई कद्र नहीं होती। भले ही व्यक्ति कितना भी नेकदिल, सच्चा और मेहनती क्यों न हो, यदि उसकी जेब खाली है तो लोग उसे हीन दृष्टि से देखते हैं और उसके अस्तित्व को ही नकार देते हैं। रिश्तों से लेकर सामान्य व्यवहार तक, हर जगह पैसों का तराजू लगाया जा रहा है। यह कविता बताती है कि पैसा न हो तो इंसान “कौन” है, यह सवाल भी समाज पूछने लगता है।
2. रिश्तों, भरोसे और प्रेम से बड़ा पैसा माना जाने लगा है:-
कविता में स्पष्ट रूप से दिखता है कि आज के दौर में रिश्तों का मूल्य भी पैसे से तय होने लगा है। प्रेम, भरोसा, अपनापन और नाता—जो कभी आत्मा के रिश्ते माने जाते थे, अब पैसों की ऊँच-नीच पर टिके हैं। लोग पैसों के सामने अपने सबसे करीबी संबंधों को भी भूल जाते हैं। रिश्तों की मजबूती भावनाओं से नहीं, पैसों की ताकत से नापी जाने लगी है। यहां तक कि प्रेम संबंधों में भी पैसा निर्णायक भूमिका निभाने लगा है। कविता बताती है कि पैसा न हो तो लोग पल भर में मुंह मोड़ लेते हैं, चाहे रिश्ता कितना भी सच्चा क्यों न हो।
3. पैसा न्याय और सच्चाई से भी बड़ा हो चुका है:-
कविता का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पैसा आज न्याय व्यवस्था पर भी हावी हो गया है। अमीर व्यक्ति चाहे कितना भी गलत क्यों न हो, वह अपने धनबल से आसानी से कानून के शिकंजे से निकल जाता है। वहीं गरीब व्यक्ति, चाहे कितना भी निर्दोष हो, पैसे की कमी के कारण कानूनी जाल में फंसकर पीड़ा सहता रहता है। यह कविता बताती है कि सच्चाई और ईमानदारी का मूल्य गिरता जा रहा है, और पैसा न्याय को खरीदने का साधन बन चुका है। यह समाज की उस कठोर सच्चाई को उजागर करती है, जहां सच्चा हार जाता है और झूठा धन के सहारे जीत जाता है।
4. पैसा सामाजिक सम्मान और प्रतिष्ठा का आधार बन चुका है:-
कविता में वर्णित यह सच्चाई बेहद कड़वी है कि आज सामाजिक सम्मान, प्रतिष्ठा और मान–मर्यादा का संबंध सीधे पैसों से हो गया है। लोग इंसान के चरित्र, ज्ञान या सदाचार को नहीं देखते, बल्कि सिर्फ उसके आर्थिक स्तर को देखते हैं। अमीर व्यक्ति को हर जगह सम्मान मिलता है—even अगर वह मूर्ख या गलत क्यों न हो—वहीं गरीब चाहे कितना भी गुणवान हो, उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह विरोधाभास मानवता को खोखला कर रहा है। कविता बताती है कि पैसा आज वह चाबी बन गया है जो समाज की हर दहलीज खोल देता है, जबकि इंसानियत दरवाजे पर खड़ी रह जाती है।
5. पैसा इंसान के व्यवहार और सोच को बदल देता है:-
कविता यह भी उजागर करती है कि पैसा इंसान के स्वभाव और व्यवहार को पल भर में बदल देता है। जिसके पास पैसा आ जाता है वह अहंकार से भर जाता है, और जिसके पास नहीं होता वह अपमान का बोझ ढोता है। लोग पैसों के आगे झुकते हैं, यहां तक कि चतुर और समझदार लोग भी अमीरों के आगे जी-हजूरी करने को मजबूर हो जाते हैं। समाज का व्यवहार इतनी जल्दी बदल जाता है कि इंसान पहचान तक नहीं पाता कि कौन अपना है और कौन पराया। यह कविता दिखाती है कि पैसा व्यक्ति की सोच, रवैया और संबंधों को किस हद तक प्रभावित करता है।
6. गरीबी इंसान को अकेला और अपमानित कर देती है:-
कविता में गरीब व्यक्ति की पीड़ा का भी गहरा चित्रण है। जब किसी के पास पैसा नहीं होता, तो रिश्तेदार, दोस्त और समाज सब उससे दूरी बना लेते हैं। लोग उसे तानों, उपेक्षा और तिरस्कार से देखते हैं। गरीबी न केवल जेब खाली करती है, बल्कि मन और आत्मा को भी अकेलापन और असहायता से भर देती है। कविता बताती है कि समाज में गरीबी अपराध नहीं, परंतु गरीब होना किसी अपराध से कम भी नहीं समझा जाता। लोग पल भर में मुंह मोड़ लेते हैं, और गरीब व्यक्ति अपने संघर्षों में अकेला छूट जाता है। यही भाव कविता का महत्वपूर्ण संदेश बनता है।
7. पैसा अपराध, छल–कपट और अन्याय की जड़ भी है:-
कविता इस सच्चाई को भी उजागर करती है कि पैसा सिर्फ अच्छाइयों का केंद्र नहीं है, बल्कि समाज में अनेक बुराइयों की जड़ भी है। पैसा पाने के लिए लोग चोरी, लूट, हेराफेरी और धोखा देने तक तैयार हो जाते हैं। लालच इंसान को उसकी नैतिक सीमाओं से बाहर ले जाता है। लोग पैसा कमाने के लिए छल-कपट, झूठ, और गलत रास्तों पर चलने से भी हिचकिचाते नहीं। कई बार पैसा इंसान का यौवन, जीवन और आत्मा तक छीन लेता है। कविता इन कड़वी सच्चाइयों को सरल शब्दों में बताती है कि पैसा इंसान का चरित्र भी बिगाड़ सकता है।
8. पैसा परिवार और रिश्तों की जड़ों को कमजोर कर रहा है:-
कविता में यह दर्द भी व्यक्त होता है कि पैसा परिवारों और रिश्तों की नींव को कमजोर कर रहा है। जहां पहले रिश्ते प्रेम, त्याग और समझ पर टिके होते थे, आज वही रिश्ते पैसों के बोझ तले टूट रहे हैं। परिवार पैसे की कमी से बिखर जाते हैं, घरों में कलह और झंझट बढ़ जाता है। भाई-भाई में, माता-पिता और बच्चों में, पति-पत्नी में दूरी बढ़ने का कारण अक्सर पैसा ही होता है। कविता बताती है कि यदि पैसा न हो तो लोग अपने ही अपनों को भूल जाते हैं। रिश्तों का मूल्य भावनाओं से नहीं, आर्थिक स्थिति से तय होने लगा है।
9. पैसा जीवन की दिशा और सपनों को नियंत्रित कर रहा है:-
कविता यह भी कहती है कि पैसा आज हर सपने, हर लक्ष्य और हर काम का आधार बन चुका है। जो सपना पैसा मांगता है, वही पूरा माना जाता है; बाकी सपने गरीबी की धूल में दब जाते हैं। घर, करियर, शिक्षा, जीवन की सुविधाएं—सब पैसा तय करता है। बिना पैसा के दालान, काया और सपने सब ढह जाते हैं। लोग पैसा न होने पर अपनों के सामने भी छोटा महसूस करते हैं। कविता यह सच्चाई दिखाती है कि आधुनिक जीवन के हर कदम पर पैसा सर्वोच्च शक्ति की तरह खड़ा है, जो तय करता है कि इंसान कितना आगे जाएगा और कितना नहीं।
10. समाज में पैसा ही सबसे बड़ा धर्म और मूल्य बन गया है:-
कविता में यह कटु सत्य उभरकर आता है कि आज पैसा ही सबसे बड़ा धर्म, कर्म और मूल्य बन चुका है। नेक-नीति, सच्चाई, ईमानदारी, प्रेम, मानवता—सब कुछ पैसे के सामने कमजोर साबित हो रहा है। लोग आदर्शों से अधिक पैसों को महत्व देने लगे हैं। ईमानदार व्यक्ति संघर्ष करता रह जाता है, जबकि चालाक और अमीर व्यक्ति समाज में सम्मानित माना जाता है। कविता इस मानसिकता पर गहरा प्रहार करती है और दिखाती है कि धन ने जीवन के हर क्षेत्र में अपनी जगह इतनी मजबूत बना ली है कि इंसान के गुण-अवगुण भी पैसा देखकर तय किए जाने लगे हैं।
11. निष्कर्ष:-
यह कविता सिर्फ शब्दों का मेल नहीं, बल्कि समाज का नग्न सत्य है। इसमें दिखाया गया है कि पैसा आज मानव जीवन का सबसे बड़ा निर्णायक तत्व बन चुका है। रिश्ते, न्याय, प्रेम, सम्मान, पहचान और सपने—सब कुछ पैसे के इर्द-गिर्द घूमने लगा है। इंसानियत कमजोर हुई है और लालच ने जगह ले ली है। कविता एक चेतावनी की तरह कहती है कि अगर समाज ने पैसा को ही भगवान बना दिया, तो भावनाएँ, रिश्ते और नैतिकता हमेशा के लिए मिट जाएँगी। यह कविता पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है कि असली मूल्य पैसा नहीं, बल्कि इंसानियत है।
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