अशांत मेरा मन,
मैंने अपने जीवन में अराजकता देखी,
देखा है मैंने एक बेकार जिंदगी,
मेरा मन अशांत है,
अथक प्रयासों का अंत असफलता में होता है,
बस लानत है इस पृष्ठभूमि,
यह मन विद्रोही हो जाता है।
चहु दिशाओ में केवल शोर,
और खामोशी की भाषा इस शोर में खो जाती है,
धीरे धीरे दिल की जुबां जुदा हो जाते है,
कुछ लोग फिर बड़े दर्द से छटपटाते हैं,
वे किसी को मना नहीं सकते।
बस अपना सिर तकिये पर रखकर कुछ लोग रोकर,
खुदको सांत्वना देकर कह रहा है,
"तुम्हें पाना मेरी किस्मत में नहीं था,
यह मैं तो समझता हूं, परंतु मेरा मन नहीं समझता।”
मैंने कई शहरों और गांवों मे घूमकर देखा है,
और कई लोगों के दिल के दर्द को समझा है।
खामोशी का रोना वह लोग किसी को समझा नहीं सकते,
मैं भाग्यशाली हूँ, लाखों दिलों का राजा बना हु,
मैं नहीं जानता कि देश-विदेश में कितने लोग मेरे लिए आँसू बहाये हैं।
उनमें से एक ने अपने दिल के दर्द के बारे में लिखा,
"मेरी जिंदगी की खुशियों की कहानी बहुत छोटी है,
जिनके बीच हँसी की कोई भाषा नहीं है,
ज़िन्दगी का दर्द ही तो छुपा है,
जिसे इस मन के अलावा कोई नहीं जानता।”
मैंने कई लोगों के मन की अनकही भाषा सुनी है,
“जिंदगी में कुछ नहीं कर पाए...?
मैं किसी के मन की चाहत नहीं बन सका....
मैं अपने जीवन को सुन्दर सज़ा नहीं सका,
मैं अपने शौक पूरे नहीं कर सका,
अंत में....
अफसोस के साथ दुनिया का एक दिन,
माया को छोड़ना होगा....!!!!!!"
"तुम पागल नहीं हो, मै अर मेरा मन पागल है,
तुम्हें क्यों पता है? क्योंकि सौबार आहत के बाद भी
मैं केवल तुम्हारे बारे में सोचता हूं।"
मैं किसी को जीतने आया था,
मैं किसी की तलाश में आया था,
मैं जीवन का अर्थ समझना चाहता था,
मै समझा नहीं पाया, मैं मुसाफिर बनकर चला गया।
जीबन की दर्द मे जो लोग कराह रहे थे,
मैं उन्हें प्रेम की भाषा देना चाहता था,
मैं उन्हें सपने देखना नहीं सिखा सका,
मैं समझा न सका, मेरे मन की भाषा।
मैं होना चाहता था युग बदलने की नेता,
मैं एक पथप्रदर्शक बनना चाहता था,
भटके हुए पथिक को कौन जानता है!
मैं निर्बाक होकर, मुसाफिर होकर चला गया।
मैं मुसाफिर हु, शब्दों की तलाश करता हु शब्दावली में,
मैं उन्हें समझा नहीं सका कि मैं कौन हूं,
जीवन की नाव कहाँ वह जाता है, ये कौन जानता है!
मैं बोल नहीं सका मन लुभानेवाला बाते,
मैं एक भटका हुआ मुसाफिर हूँ।
मैं मुसाफिर जिंदगी का मतलब ना समझा सका,
कौन किसकी सुनता है, जिंदगी बेतरतीब है,
मैं सपनों की नाब सजाना चाहता था,
मैं कोरे कागज पर जिंदगी की जीत की कहानी लिखना चाहता था,
मैं असहाय था, जिंदगी जीने का मतलब नहीं समझा पा रहा था।
जीवन केवल संघर्ष है, केवल आत्म-बलिदान की भाषा समझता है,
तो किसी की बिरहगाथा, किसी की आत्मकथा,
किसी के दिल का दर्द तो किसी की तकरार,
दुनिया वाकई अजीब है, समझाना नामुमकिन है,
जिंदगी वाकई खूबसूरत होती,
यदि मैं सपनों की नाब सजाया होता,
वह नाब जीवन की लहरों के साथ बह गया होता।
देखते देखते तू किसी अर की हो गई,
मै बस यु ही देखता रहा,
बेबस था, कुछ कह ना पाया,
जीबन की खेल मे कही हार तो कही जीत,
ये तो मै देख देख बड़ा हुआ,
शायद आज मंजिल मे कोई साथ होता,
ख़ुशी कितना और कितना होता,
मंजिल तो आज मुझे मिल ही गई,
मै बस अकेला, ख़ुशी मै किससे बाटू,
मै बस देखता रहा तू किसी अर की गई।
जिंदगी मुझ से कह रहा है कुछ बात,
अकेला ही तो दुनिया मे आया है,
फ़िक्र मत कर, कोई दे या ना दे साथ,
चलता कर अकेला तू, ये जंग की मयदान है,
बिस्वास कर आपने ऊपर, जीत तेरा पक्की है।
मैंने भी जिंदगी को कह दी है दो बात,
लड़ता लड़कर मै आया है,
जीबन की जोखिम को मै पल पल देखा है,
हार और जीत ये तो बस खेल है,
जो मै बचपन से खेलते आया है,
आसानी से मयदान से भागनेवाला मै नहीं है,
मन मै रखा ना मै कोई डर की बात।
पल पल मै जंग लड़ा है,
हर जंग ने कुछ ना कुछ सिखाया कुछ बात,
कुछ जंग लड़ना मजा ही कुछ अलग है,
ये मजा और अधिक होता,
यदि होता तू आज मेरा साथ।
जिंदगी की कारबा भी क्या अजीब है,
ना चाहकर भी मुड़ना पड़ता है,
ना चाहकर भी पीछे खींचना पड़ता है,
कभी कारबा देखो तो कभी कुछ अर।
क्या अजीब दास्तान है जीबन मे,
किसीका का कोरा कागज भरा ही नहीं,
तो कोई कोरा कागज भर ही नहीं पा रहे है,
अर तो अर किसीको ना चाहकर भी भरना पड़ रहा है,
जैसे मै।
जिंदगी की दास्तान भी ना जाने कितनी कहानी लिख दी,
शायद कोई होता मंजिल के साथ,
ख़ुशी कुछ अर ही होती,
मै भी दास्तान पर कुछ अर लिख दी होती।
मंजिल भी बारबार मिलता भी नहीं,
शायद किस्मत को जिन्होंने आजमाया है,
ठोकरें उन्होंने भी खूब खाया है,
जिन्होंने बड़ा किस्मत लेकर आया है।
मिली है मंजिल बड़े मेहनत से,
ना जाननेवाला कहेगा बड़ा भाग्यवान,
और जाननेवाला कहेगा बड़ा दुखी इंसान,
और तो शायद ही कोई कहेगा बड़ा मेहनती इंसान।
छुया है मैंने मंजिल को,
ख़ुशी ने मेरा कदम चूमा है,
ये ख़ुशी और अधिक होता,
यदि तू आज मेरा साथ होता।
उस ऊचाई को मैंने छुया हु,
जहापर मै अकेला खड़ा हु,
देख रहा हु दुनिया को सब पीछे छूट गए,
मै अकेला पक्षी उड़ रहा हु,
आज ख़ुशी कितना होता,
यदि होता तू आज मेरा साथ।
तू देखेगा एकदिन मै कहा पंहुचा हु,
तू देखेगा वो दिन, तूने क्या खोया है,
तू करेगा मुझे याद, आंसूओ के साथ,
तू कहेगा अपना नसीब को, करेगा तू फरियाद।
पछताबा एकदिन करेगा तू,
तूने क्या खोया है, रोकर अब क्या फायदा,
तूने हिरे जो खोया है, अब पछताके क्या होगा,
जब चिड़िया चुग गई खेत।
संघर्ष के बीच आज मुझे जीने का मतलब मिल गया,
आज जिंदगी बहुत खूबसूरत हो गई है, मुझे पूरी खुशी मिल गई है,
आज मेरी तपस्या सफल हुई है, मुझे मानसिक शांति मिली है,
जीवन युद्ध आज सफल हो गया, मुझे जीवन का अर्थ मिल गया।
1. मन की अशांति और जीवन की अराजकता:-
कविता का आरंभ मन की गहन अशांति से होता है, जहाँ कवि जीवन की अराजकता और बेकारपन को देखकर विद्रोही हो उठता है। अथक प्रयासों का अंत असफलता में होना और पृष्ठभूमि का अभिशाप-सा बोझ व्यक्ति को तोड़ देता है। यह भाव जीवन की अनिश्चितता को उजागर करता है, जहाँ हर कदम पर निराशा का साया मंडराता है। कवि का मन शांत होने को तैयार नहीं, बल्कि विद्रोह की आग में जलता है। यह आधुनिक मानव की आंतरिक कलह का प्रतीक है—बाहरी दुनिया की भागदौड़ में खोया हुआ आत्मा, जो अर्थ की तलाश में छटपटाती है। कविता यहाँ पाठक को अपनी ही पीड़ा से जोड़ लेती है, सवाल उठाती है कि क्या जीवन वास्तव में इतना व्यर्थ है?
2. शोर में खोई खामोशी और हृदयों का विखंडन:-
कविता में चारों दिशाओं का शोरगुल आंतरिक खामोशी को निगल लेता है, जिससे दिलों की जुबानें अलग हो जाती हैं। लोग दर्द में छटपटाते हैं, लेकिन किसी को मना नहीं पाते। यह भाव आधुनिक जीवन की विडंबना को चित्रित करता है, जहाँ बाहरी हलचल भावनाओं को दबा देती है। खामोशी की भाषा शोर में विलीन होकर व्यक्ति को और अधिक एकाकी बना देती है। कवि यहाँ सामूहिक पीड़ा का वर्णन करता है—प्रेम, दुख या इच्छाएँ अनकही रह जाती हैं। यह पंक्तियाँ पाठक को सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हमारी दुनिया में सच्ची संवाद की जगह बची है? शोर के बीच खामोशी का दर्द ही तो जीवन का सच्चा रहस्य है।
3. एकांत में रोना और भाग्य की स्वीकृति:-
तकिए पर सिर रखकर रोना और खुद को सांत्वना देना—यह कविता का हृदयस्पर्शी दृश्य है। कवि कहता है, "तुम्हें पाना मेरी किस्मत में नहीं था," लेकिन मन स्वीकार नहीं करता। यह द्वंद्व प्रेम की अमर तड़प को दर्शाता है, जहाँ बुद्धि भाग्य को झुक जाती है, किंतु हृदय विद्रोह करता रहता है। एकांत की गोपनीयता में बहते आँसू अनकहे दर्द को उजागर करते हैं। कविता यहाँ मानवीय कमजोरी को छूती है—स्वीकृति का प्रयास विफल, क्योंकि भावनाएँ तर्क से परे होती हैं। पाठक खुद को इस दर्पण में देखता है, जहाँ हर असफल प्रेम की कहानी दोहराई जाती है। यह भाव जीवन की कठोरता के बीच कोमलता का प्रतीक है।
4. दुनिया के दर्दों का साक्षी और कवि का राजा-भाव:-
कवि मुसाफिर की भाँति शहरों-गाँवों में भटकता है, लोगों के हृदय-दर्द को समझता है। खामोशी का रोना कोई बता नहीं पाता, लेकिन कवि खुद को "लाखों दिलों का राजा" मानता है। अनजाने आँसू उसके लिए बहते हैं। यह भाव कवि की संवेदनशीलता को रेखांकित करता है—वह दर्द का साक्षी मात्र नहीं, बल्कि साझेदार है। कविता यहाँ कला की शक्ति को उजागर करती है, जो अनकही पीड़ाओं को शब्द देती है। कवि भाग्यशाली है, क्योंकि उसके माध्यम से करोड़ों की आवाज़ गूँजती है। यह पाठक को प्रेरित करता है कि दर्द साझा करने से हल्का होता है। कवि का राजा-भाव विनम्रता से भरा है, जो मानवता की एकता का संदेश देता है।
5. दूसरों के दर्दों की प्रतिध्वनि:-
कविता में एक व्यक्ति की डायरी-सी अभिव्यक्ति है: खुशियाँ छोटी, हँसी की भाषा न होने से दर्द छिपा रहता है। अन्य की अनकही इच्छाएँ—सपने अधूरे, शौक न पूरे, अंत में अफसोस। यह भाव सार्वभौमिक पछतावे को प्रतिध्वनित करता है, जहाँ जीवन की कहानी अधूरी रह जाती है। मन के अलावा कोई नहीं जानता इन दर्दों को। कवि इन्हें अपनी आवाज़ देकर जीवंत बनाता है, पाठक को अपनी कहानी से जोड़ता है। यह पंक्तियाँ अस्तित्ववादी संकट को छूती हैं—क्या हमने जीवन को सजाया? अफसोस के साथ दुनिया छोड़ना ही तो नियति है। कविता यहाँ करुणा जगाती है, हमें अपने अधूरेपन पर विचार करने को विवश करती है।
6. प्रेम की जिद और विद्रोह:-
"तुम पागल नहीं हो, मेरा मन पागल है"—यह पंक्ति प्रेम की विकृति-सी जिद को उजागर करती है। सौ बार आहत होने पर भी केवल तुम्हें सोचना। कविता यहाँ प्रेम की शुद्धता और पीड़ा का मिश्रण चित्रित करती है, जहाँ दर्द भूलने न देता। मन का विद्रोह तर्क को चुनौती देता है, प्रेम को अमर बनाता है। यह भाव हर प्रेमी की कहानी है—जख्मों के बावजूद लौटना। कवि पाठक को यह सिखाता है कि प्रेम पागलपन ही तो है, जो जीवन को अर्थ देता है। लेकिन यह जिद दर्द भी लाती है, एक चक्र बनाती है। कविता की यह गहराई भावुकता से भर देती है, प्रेम को जीवन का सार मानती है।
7. मुसाफिर की तलाश और असफलता:-
कवि प्रेम जीतने, अर्थ खोजने, सपने सिखाने आया था, लेकिन असफल रहा। नेता या पथप्रदर्शक बनना चाहा, किंतु भटका मुसाफिर बन गया। यह भाव जीवन की यात्रा की अनिश्चितता को दर्शाता है—उद्देश्यपूर्ण आगमन, अर्थहीन प्रस्थान। शब्दों की तलाश में भटकना कवि की असहायता को उजागर करता है। कविता यहाँ महत्वाकांक्षा की टूटन को चित्रित करती है, जहाँ सपने टूटते हैं। पाठक खुद को इस मुसाफिर में पहचानता है—जीवन की नाव कहाँ जाती है, कौन जानता? यह पंक्तियाँ निराशा के बीच आशा की किरण जगाती हैं, यात्रा ही तो मंजिल है। कवि का निर्बाक प्रस्थान हृदय को छू जाता है।
8. जीवन की बेतरतीबी और सपनों की नाव:-
जीवन बेतरतीब है—कोई सुनता नहीं, संघर्ष और बलिदान ही भाषा समझता है। कवि सपनों की नाव सजाना चाहता था, लेकिन लहरें बहा लेतीं। यह भाव दार्शनिक गहराई देता है—दुनिया अजीब, बिरहा और तकरार ही सच्चाई। यदि सपने सजाए होते, जीवन सुंदर होता। कविता यहाँ नियति की विडंबना को उजागर करती है, जहाँ इच्छाएँ व्यर्थ जाती हैं। पाठक को सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम अपनी नाव खुद सजा सकते हैं? यह पंक्तियाँ जीवन को एक नदी-सा चित्रित करती हैं—बहाव में बहना या तैरना? कवि का असहाय भाव करुणा जगाता है, लेकिन संघर्ष की सुंदरता भी सिखाता है।
9. प्रेम की हार और साक्षी-भाव:-
"देखते देखते तू किसी और की हो गई"—यह पंक्ति प्रेम की हार का मार्मिक चित्र है। कवि बेबस साक्षी बन देखता रहता है, जीवन का खेल खेला जाता है। सफलता मिली, लेकिन अकेलेपन में अधूरी। यह भाव अनुरक्ति के दर्द को उजागर करता है—निष्क्रियता का कष्ट। कविता यहाँ प्रेम को जीवन का पूरक मानती है, बिना उसके खुशी बाँटने लायक नहीं। पाठक हृदय-विदीर्ण होता है, खुद की कहानियों को याद करता है। जीवन कहीं हार, कहीं जीत—लेकिन साथी का अभाव सब व्यर्थ कर देता है। यह पंक्तियाँ भावुक चरम पर ले जाती हैं, प्रेम की अनिवार्यता सिखाती हैं।
10. संघर्ष से मुक्ति: अंतिम शांति:-
कविता का क्लाइमेक्स संघर्ष में अर्थ प्राप्ति है—जिंदगी खूबसूरत, तपस्या सफल, शांति मिली। जीवन का युद्ध जीतकर मुक्ति का आनंद। यह भाव निराशा से आशा की यात्रा दर्शाता है—आत्म-युद्ध की विजय। कवि मुसाफिर से स्थायी बनता है, अर्थ पाकर तृप्त। कविता यहाँ प्रेरणा देती है कि दर्द ही तो शांति का द्वार है। पाठक को संदेश: संघर्ष करो, अर्थ मिलेगा। यह अंतिम पंक्तियाँ आशावादी हैं, जीवन को सुंदर बनाती हैं। मानसिक शांति का प्राप्त होना कविता को पूर्णता देता है, पाठक को नई ऊर्जा से भर देता है।
निष्कर्ष:-
यह कविता जीवन की यात्रा का प्रतीक है—अशांति से शांति, तड़प से तृप्ति, हार से जीत की ओर। कवि मुसाफिर की भाँति भटकता है, प्रेम और सपनों की तलाश में, लेकिन संघर्ष से अर्थ प्राप्त करता है। मुख्य बिंदु दर्द, विद्रोह, एकाकीपन और मुक्ति को उजागर करते हैं, पाठक को अपनी पीड़ा से जोड़ते हैं। प्रेम को जीवन का सार मानती यह रचना दार्शनिक गहराई के साथ भावुकता का मिश्रण है। अंततः संदेश स्पष्ट: सपने संजाओ, संघर्ष करो, शांति पाओ। यह कविता न केवल दर्द साझा करती है, बल्कि आशा की किरण भी जगाती है, मानवता की एकता का गान गाती है।

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